
बात 1958 के आसपास की है आनन्दमार्ग प्रचारक संघ अभी अपने शैशवावस्था में ही था । उन दिनों आचार्य नगीना दादा, आचार्य दीपनारायण धर्ममित्रम् पूर्णियाँ में पदस्थापित थे । उन लोगों ने अर्रहा ( सहर्षा ) में धर्म महाचक्र आयोजित करवाने के लिए पूज्य गुरुदेव बाबा के पास आवेदन दिया जिसे बाबा ने स्वीकृति किया । आचार्य नगीना दादा की योजना थी कि इस धर्म महाचक्र को भगवान श्रीकृष्ण के पुनः ब्रज लौटने जैसे आयोजित किया जाय । हाथी पर बाबा का आगमन हो । इस हेतु आसपास के सारे हाथी वाले को भगवान श्री श्री आनन्दमुर्ती जी के आगमन तथा उनके स्वागत हेतु कहा गया । हथवानो ने 100 रू माँगा पर मेरे दादाजी स्वर्गीय सुशील कुमार सिंह ने अपना हाथी ( जिसका नाम निर्मल था) बिना किसी खर्च के बाबा की सवारी के लिए देने का निवेदन किया । हाथी पर चॉदी का होदा ( मंच) पास के सोनवर्षा राज के पास से लिया गया । यह मंच करीब 2.5 मन यानी 100 किलो वजन का था , हाथी अभी बच्चा था तथा इससे पहले कभी इतनें बड़े आयोजन में भाग नहीं लिया था । हाथी नगाड़े या ढोल के आवाज पर अनियंत्रित ( भड़क) हो जाता था । पूरे आर्रहा के आसपास के गांवों में यह बात आग के तरह फैल गई थी कि भगवान आ रहें हैं और उन्हें देखने के लिए सारे लोग इकट्ठा थे । कुछ लोग अपने बंदूक लेकर भी आये थे , कुछ लोग बाबा को मारने के विचार से भी आये थे । बाबा का आगमन रेलगाड़ी से हुआ, उनकी रेलगाड़ी मिठाई ( मठाही) स्टेशन पर रूकी । यहॉ से उन्हें हाथी पर अर्रहा ले जाना था । काला रंग का हाथी जिसे सुरुचि से सजाया गया पर श्वेत रंग का जगमगाता चॉदी का होदा और उस पर भक्त वत्सल, गौर वर्ण, हसमुख, भव्य रूप प्रभु रेशमी वस्त्र धारण किये, आखों में काले रंग का ऐनक तथा पॉव में काले रंग का जुता मानो धने बादलों के ओट से चॉद निकला हो विराजमान थे, आचार्य प्रणय कुमार चटर्जी जो बाबा के तत्कालीन आप्त सचिव तथा आनन्दमार्ग के सामान्य सचिव भी थे छाता लेकर हाथी पर बैठे । प्रभु का यह अद्भुत रूप जिसने अपनी आखों से देखा हो कितना सौभाग्यशाली होगा । आगे आगे दादाजी हाथी की सूंड पकड़कर चले पिछे सारे लोग नाचते-गाते, ढोल-नगाड़े बजाते तथा प्रभु का जय-जयकार करते चले । स्थानीय स्त्रीयों ने आरती गा कर तथा फूल बर्षा कर प्रभु का स्वागत किया ।